भारत की हेल्थकेयर व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दवाओं की कीमतों को लेकर सामने आए एक ताज़ा खुलासे ने पूरे सिस्टम की पोल खोल कर रख दी है।
DERMIPINK CT5 (15g) नाम की क्रीम को लेकर हैरान करने वाला आंकड़ा सामने आया है—
- स्टॉकिस्ट को कीमत (PTS) – ₹23
- रिटेलर ट्रेड प्राइस – ₹27.50
- MRP – ₹101

यानी मेडिकल स्टोर जिस दवा को ₹27 में खरीदता है, वही दवा मरीज को ₹101 में बेच सकता है। सीधी भाषा में कहें तो मरीज की जेब पर 300–400% तक का बोझ।
इस खुलासे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
- आखिर एक ऐसी दवा जिसका वास्तविक उत्पादन और वितरण खर्च ₹30 से भी कम है, उसका MRP ₹101 कैसे तय किया जाता है?
- क्या NPPA, हेल्थ मिनिस्ट्री और ड्रग कंट्रोलर इस ज़बरदस्त मार्जिन को अनदेखा कर रहे हैं?
- क्या दवाओं का MRP सिर्फ कंपनियों और मेडिकल दुकानदारों की कमाई बढ़ाने का लाइसेंस बन चुका है?
- दवाओं को कॉस्मेटिक की तरह 3–5 गुना प्रॉफिट मार्जिन किस नियम के तहत मिलता है?
- और सबसे बड़ा सवाल—मरीज से वसूले जा रहे इन अतिरिक्त पैसों का हिसाब कौन देगा?
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में दवाओं का MRP सिस्टम एक “चुपचाप चलने वाला लूट तंत्र” बन चुका है, जहाँ कंपनियाँ कीमतें अपनी मर्ज़ी से तय करती हैं और पूरा सप्लाई चेन — स्टॉकिस्ट से लेकर मेडिकल स्टोर्स तक — उस मुनाफे का हिस्सा बन जाता है।
नतीजा?
मरीज हर बार ठगा जाता है।
इलाज महंगा हो रहा है और आम नागरिक की जेब लगातार खाली होती जा रही है।
अब जनता का सवाल साफ है—
सरकार दवाओं के MRP पर सख्त नियंत्रण, पारदर्शी प्राइस फिक्सेशन और मार्जिन कैपिंग कब लागू करेगी?
या फिर दवाओं की यह “तयशुदा लूट” यूँ ही चलती रहेगी?
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