राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि भारतीय संविधान की मूल भावना सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की है। उन्होंने बताया कि संविधान की प्रस्तावना का पहला शब्द ‘हम’ इस बात का प्रतीक है कि पूरा भारत एक साझा इकाई है, जहाँ समाज के सभी वर्ग मिलकर एक समान उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हैं।
डॉ. भागवत ने कहा कि यह समावेशी सोच कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में यह भावना प्राचीन काल से निहित रही है। भारतीय धर्म और दर्शन में सदैव सभी के कल्याण और सामूहिक प्रगति पर बल दिया गया है।
वे ‘अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना’ के तत्वावधान में आयोजित ‘भारतीय इतिहास, संस्कृति और संविधान’ विषयक सेमिनार को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि संविधान एक लिखित दस्तावेज़ है, जो पूरे देश और समाज को दिशा प्रदान करता है और सभी को उसके अनुरूप चलना होता है।
उन्होंने ब्रिटिश शासन काल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय ‘हम’ जैसी सामूहिक भावना को कोई महत्व नहीं दिया गया, क्योंकि अंग्रेज भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्वीकार ही नहीं करते थे। इसके विपरीत, भारतीय संविधान के पृष्ठों पर अंकित चित्र और प्रतीक भारत के मूल धर्म, संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करते हैं।
डॉ. भागवत ने कहा कि संविधान का निर्माण करने वाले लोग भारतीय परंपराओं और संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए थे, इसी कारण संविधान में भारत की आत्मा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि समाज के सामने हमारी परंपराओं के वास्तविक और प्रामाणिक तथ्यों को समझदारी के साथ प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि जब समाज परस्पर सहयोग और सामूहिक भावना के साथ आगे बढ़ेगा, तभी देश मजबूत बनेगा और विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ सकेगा।
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