अगर राजकीय पशु भी नहीं बचे, तो जंगल किसके भरोसे?वन्यजीव संरक्षण फेल
छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण अब केवल काग़ज़ों और भाषणों तक सीमित होता दिख रहा है। कबीरधाम जिले के धवईपानी इलाके में शिकारियों ने छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वनभैंसा (गौर) को करंट लगाकर मौत के घाट उतार दिया। यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब दो दिन पहले ही राज्य में एक बाघ और दो तेंदुओं के शिकार की खबरें सामने आई थीं।
लगातार हो रही इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जंगलों की निगरानी सिर्फ फाइलों में हो रही है? जिन वन्यजीवों को बचाने के लिए सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, वही आज शिकारियों के लिए सबसे आसान निशाना बनते जा रहे हैं।
वनभैंसा, जिसे छत्तीसगढ़ की पहचान और गौरव माना जाता है, अगर वह ही जंगल में सुरक्षित नहीं है तो आम वन्यजीवों की सुरक्षा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। करंट बिछाकर शिकार करना दर्शाता है कि शिकारी न केवल बेखौफ हैं, बल्कि उन्हें कानून और प्रशासन का कोई डर भी नहीं है।
वन विभाग और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। क्या गश्त सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है? क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की हिम्मत सरकार दिखाएगी, या फिर हर बार की तरह यह मामला भी जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
राज्य सरकार की वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता अब संदेह के घेरे में है। बाघ, तेंदुए और अब राजकीय वनभैंसा की मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह शासन-प्रशासन की नाकामी का आईना हैं। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में जंगलों में सिर्फ सन्नाटा ही बचेगा।
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