मुंबई की आर्थिक दुनिया में हलचल तब मच गई जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सुमाया ग्रुप की कंपनियों के प्रमोटर उशिक गाला को गिरफ्तार कर लिया। धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत हुई यह कार्रवाई 17 नवंबर को की गई, जब जांच एजेंसी को ऐसे पुख्ता सबूत मिले जिन्हें नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं था। कोर्ट ने उन्हें 24 नवंबर तक ईडी की हिरासत में भेज दिया है।
इस पूरे मामले की जड़ें सरकार के ‘Need to Feed’ प्रोग्राम में छिपी थीं — एक ऐसा प्रोग्राम जो आम लोगों तक संसाधन पहुंचाने के लिए बनाया गया था। लेकिन जांच में सामने आया कि इस योजना के नाम पर ₹5,000 करोड़ के लेनदेन में सिर्फ 10% ही असली थे, बाकी सब एक सुनियोजित ‘कागज़ी कारोबार’। आरोप है कि इस स्कैम के जरिए ₹137 करोड़ की सरकारी राशि का गबन किया गया।
यह जांच वर्ली पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से शुरू होकर ईओडब्ल्यू मुंबई तक पहुंची, और फिर ईडी की गहन जांच ने पूरा सच धीरे-धीरे उजागर कर दिया।
जांच के अनुसार, M/s Dentsu Communications India Pvt Ltd, M/s Sumaya Industries Ltd और इनके प्रमोटरों ने मिलकर एक ऐसी साजिश रची, जिसके तहत ‘Need to Feed’ प्रोग्राम का झूठा लाभ दिखाकर करोड़ों रुपये की हेराफेरी की गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सुमाया ग्रुप और Dentsu के कुछ कर्मचारियों ने, कथित तौर पर, हरियाणा सरकार के नाम पर एक फर्जी टेंडर तैयार किया। नकली एग्री-ट्रेडर्स, फर्जी बिल, बनावटी लॉरी रसीदें — हर वह चीज तैयार की गई ताकि ऐसा दिखाया जा सके कि कंपनी बड़े पैमाने पर कृषि खरीद कर रही है।
लेकिन हकीकत में एक भी असली खरीद नहीं हुई।
सारा पैसा पहले नकली कंपनियों को भेजा गया, फिर RTGS और कैश के जरिए वापस उशिक गाला तक लौटा दिया गया।
फर्जी दस्तावेज़ों की मदद से ₹5,000 करोड़ तक के लेनदेन सर्कुलर पैटर्न में घुमाए गए, जिससे कंपनियों का टर्नओवर कागज़ में कई गुना बढ़ गया। सिर्फ दो साल में सुमाया का टर्नओवर ₹210 करोड़ से सीधे ₹6,700 करोड़ दिखने लगा। इसके चलते कंपनी के शेयरों में जबरदस्त उछाल आया और निवेशकों को एक पूरी तरह ग़लत तस्वीर दिखाई गई।
ईडी ने इस स्कैम के सिलसिले में मुंबई, दिल्ली और गुरुग्राम में 19 ठिकानों पर छापे मारे और भारी मात्रा में डिजिटल रिकॉर्ड, वित्तीय दस्तावेज़ व अन्य अहम सबूत बरामद किए।
जांच अभी जारी है, और माना जा रहा है कि इस फर्जीवाड़े का दायरा और भी बड़ा हो सकता है।
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