पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मतदान खत्म होने के साथ ही राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। इस बार सीमांचल के जिलों में रिकॉर्ड वोटिंग ने सबका ध्यान खींच लिया है। कोई इसे अपनी जीत का संकेत मान रहा है, तो कोई इसे जनता का मूड बदलने का इशारा बता रहा है। सबसे ज्यादा चर्चा किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जिलों की हो रही है, जहां इस बार मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट डाला है।
सीमांचल का समीकरण क्या कहता है
सीमांचल में चार जिले हैं – किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया। ये क्षेत्र पारंपरिक रूप से महागठबंधन का गढ़ माने जाते रहे हैं। पिछली बार महागठबंधन के पास किशनगंज और कोचाधामन जैसी सीटें थीं, जबकि अररिया और कटिहार में भाजपा-जदयू (एनडीए) का अच्छा प्रदर्शन रहा।
पूर्णिया में AIMIM और कांग्रेस की मौजूदगी ने समीकरण और जटिल बना दिए हैं। AIMIM के चार विधायकों के राजद में जाने के बाद ओवैसी ने नाराजगी जाहिर की थी और इस बार उन्होंने अकेले दम पर मैदान संभाला है।
सीमांचल पर सबकी नजर क्यों
सीमांचल मुस्लिम बहुल इलाका है, और यही वजह है कि सभी दल यहां अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक पिछले कुछ वर्षों में यहां कई बार आ चुके हैं।
महागठबंधन के लिए यह इलाका अस्तित्व की लड़ाई का केंद्र है। राजद के लिए यह MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण का मजबूत इलाका है, वहीं कांग्रेस यहां पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक पर भरोसा रखती है।
इस बार जन सुराज के प्रशांत किशोर ने भी इस क्षेत्र में अपने संगठन की जड़ें जमाने की कोशिश की है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
AIMIM का ‘खेल बदलने’ का प्रयास
पिछले चुनाव में AIMIM ने सीमांचल में धमक दिखाई थी। पांच सीटें जीतकर उन्होंने मुसलमानों की राजनीति में नई जमीन बनाई थी। हालांकि, चार विधायक बाद में राजद में चले गए। ओवैसी ने इस बार कांग्रेस-राजद पर “वोट चोरी” का आरोप लगाते हुए मुस्लिम मतदाताओं से नई राजनीति की अपील की है।
उनका कहना है कि “महागठबंधन मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक मानता है, हक नहीं देता।” इस रणनीति से AIMIM सीमांचल में फिर एक बार सक्रिय दिख रही है।
कौन से मुद्दे रहे प्रभावी
इस बार सीमांचल में कई मुद्दों ने मतदाताओं को प्रभावित किया है।
- वक्फ कानून पर विरोध: मुस्लिम समुदाय में असंतोष दिखा, जिससे महागठबंधन को कुछ लाभ हो सकता है।
- मतदाता सूची से नाम हटाने का विवाद: कांग्रेस-राजद ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया।
- दिल्ली धमाकों का असर: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हिंदू मतदाता इस घटना के बाद ज्यादा संख्या में वोट डालने पहुंचे, जिससे एनडीए को फायदा हो सकता है।
इस बार सीमांचल की वोटिंग ने सबको चौंकाया है। बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत किसी एक दल के पक्ष में गया या विरोध में, यह 14 नवंबर को साफ होगा। फिलहाल, सीमांचल बिहार की राजनीति की सबसे बड़ी पहेली बन गया है — जहां हर दल अपनी जीत का दावा कर रहा है।
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