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लिपुलेख विवाद में चीन की दो टूक: नेपाल-भारत का आपसी मसला, हम नहीं पड़ेंगे बीच में

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नई दिल्ली/काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने हाल ही में चीन के तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) समिट के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने लिपुलेख विवाद का मुद्दा उठाया, लेकिन उन्हें उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला। जिनपिंग ने साफ कहा कि लिपुलेख का मसला भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला है, और इसे दोनों देशों को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए। इस बयान ने नेपाल के उन नेताओं को निराश किया है, जो चीन से समर्थन की उम्मीद कर रहे थे।

क्या है लिपुलेख विवाद?

लिपुलेख दर्रा उत्तराखंड में भारत, नेपाल और चीन की त्रिकोणीय सीमा पर स्थित है। नेपाल का दावा है कि 1816 की सुगौली संधि के तहत महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा शामिल हैं, उसका हिस्सा है। नेपाल ने 2020 में अपने नए राजनीतिक नक्शे में इन क्षेत्रों को शामिल किया था, जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया। भारत का कहना है कि ये क्षेत्र ऐतिहासिक और प्रशासनिक रूप से उसके हिस्से हैं और लिपुलेख के जरिए भारत-चीन व्यापार 1954 से होता आ रहा है।

भारत-चीन व्यापार समझौते से नेपाल की नाराजगी

18 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे समेत तीन मार्गों से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने का फैसला किया। इस समझौते पर नेपाल ने कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि उसका मानना है कि लिपुलेख उसकी संप्रभु भूमि पर है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन को अलग-अलग राजनयिक नोट भेजकर इस पर विरोध दर्ज कराया।

चीन का तटस्थ रुख

नेपाल के विदेश सचिव अमृत बहादुर राय ने बताया कि ओली ने जिनपिंग के सामने लिपुलेख को व्यापारिक मार्ग के रूप में इस्तेमाल करने के भारत-चीन समझौते पर सवाल उठाया। जवाब में जिनपिंग ने कहा, “लिपुलेख एक पारंपरिक सीमा दर्रा है, और इसके संचालन के लिए पहले से समझौता है। चीन नेपाल के दावे का सम्मान करता है, लेकिन यह भारत-नेपाल का द्विपक्षीय मुद्दा है।” चीन के इस बयान से साफ है कि वह इस विवाद में उलझना नहीं चाहता।

भारत का स्पष्ट रुख

भारत ने नेपाल के दावों को बार-बार खारिज किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “लिपुलेख के जरिए भारत-चीन व्यापार 1954 से चल रहा है। नेपाल के दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं और न ही उचित हैं।” भारत ने नेपाल से कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने की प्रतिबद्धता जताई है।

नेपाल की राजनीति में उबाल

नेपाल में लिपुलेख विवाद ने राष्ट्रवादी भावनाओं को हवा दी है। विपक्षी दल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने ओली से इस मुद्दे को भारत और चीन के सामने और मजबूती से उठाने की मांग की है। हालांकि, चीन के तटस्थ रुख ने नेपाल की उम्मीदों को झटका दिया है।

आगे क्या?

लिपुलेख विवाद भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चला आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों को ऐतिहासिक तथ्यों, नक्शों और कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस मसले का समाधान करना चाहिए। भारत और नेपाल के बीच 1950 की शांति और मैत्री संधि के तहत मजबूत सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते हैं, जो इस विवाद को सुलझाने में मददगार हो सकते हैं।

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