रायपुर। झीरम घाटी नक्सली हमले को बारह वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस बहुचर्चित हत्याकांड की जांच आज भी अपने निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी है। इस दौरान छत्तीसगढ़ में पांच साल कांग्रेस और सात साल भाजपा की सरकार रही, वहीं 2014 से केंद्र में भी एनडीए की सत्ता है। इसके बावजूद पीड़ित परिवारों को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है और जांच को लेकर कई सवाल जस के तस बने हुए हैं।
वर्तमान विष्णु देव साय सरकार के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद भी एसआईटी जांच को आगे बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस पहल नजर नहीं आ रही है। इसी बीच 22 दिसंबर को जांजगीर-चांपा में आयोजित जनादेश परब के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। नड्डा ने आरोप लगाया कि झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं की हत्या के पीछे कांग्रेस के ही लोग थे, जिससे जांच में देरी को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गया।
2013 के बाद से प्रदेश में सबसे लंबा शासन भाजपा का रहा है। डॉ. रमन सिंह की सरकार चार साल सत्ता में रही, इसके बाद पांच साल भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी और अब दो वर्षों से विष्णु देव साय की भाजपा सरकार सत्ता संभाल रही है। सत्ता परिवर्तन के बावजूद झीरम कांड में अब तक कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
घटना के बाद एनआईए ने मामले की जांच शुरू करते हुए 39 माओवादियों के खिलाफ दो चार्जशीट दाखिल कीं और नौ आरोपियों को गिरफ्तार भी किया, लेकिन कांग्रेस ने इस जांच को अधूरा बताते हुए सवाल खड़े किए। 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद एसआईटी का गठन किया गया, जिसे एनआईए ने अदालत में चुनौती दी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस को जांच की अनुमति दी, लेकिन इसी दौरान 2023 के विधानसभा चुनाव आ गए और सत्ता एक बार फिर बदल गई।
अब कांग्रेस का आरोप है कि एसआईटी को वैधानिक अनुमति मिलने के बावजूद राज्य सरकार जानबूझकर जांच को आगे नहीं बढ़ा रही है। वहीं भाजपा का कहना है कि कांग्रेस अपनी सरकार के पांच साल में झीरम कांड की जांच को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाई और अब राजनीति कर रही है।
झीरम कांड की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग भी राजनीतिक विवादों में उलझा रहा। 2013 में गठित जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा आयोग ने आठ साल बाद 2021 में 4,184 पन्नों की रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी, लेकिन कांग्रेस सरकार ने रिपोर्ट को अधूरी बताते हुए इसे विधानसभा में पेश नहीं किया और नया आयोग गठित कर दिया। बाद में हाई कोर्ट ने नए आयोग की प्रक्रिया पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि पहली रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत किए बिना नई जांच उचित नहीं है।
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से जगदलपुर लौट रही थी। शाम करीब चार बजे झीरम घाटी के पास माओवादियों ने पेड़ गिराकर काफिला रोका और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल, उदय मुदलियार समेत 32 लोगों की जान चली गई थी। यह हमला छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े राजनीतिक हत्याकांडों में गिना जाता है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार एसआईटी से जांच नहीं कराकर जानबूझकर मामले को दबा रही है और जेपी नड्डा का बयान झीरम में शहीद कांग्रेस नेताओं का अपमान है। वहीं उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस अपनी सरकार के दौरान झीरम कांड को लेकर किए गए दावों और कथित सबूतों का जवाब दे।
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