नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ विपक्ष द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने के बाद न्यायिक जगत में हलचल तेज हो गई है। इसी बीच देश के 56 पूर्व न्यायाधीशों ने इस प्रयास को “न्यायपालिका को धमकाने की खुली कोशिश” बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज की है।
पूर्व जजों की ओर से जारी किए गए समर्थन पत्र में कहा गया है कि अगर इस तरह के राजनीतिक दबाव को बढ़ावा दिया गया, तो यह भारत की लोकतांत्रिक नींव और न्यायिक स्वतंत्रता को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। उन्होंने इसे उन न्यायाधीशों पर हमला बताया है, जो किसी खास वैचारिक या राजनीतिक उम्मीद के मुताबिक फैसले नहीं सुनाते।
पत्र में 1975 के आपातकाल का उल्लेख करते हुए पूर्व जजों ने चेतावनी दी कि “अंधकारमय दौर में भी जजों को दबाने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल हुआ था — पदोन्नति रोकना भी इनमें शामिल था। इतिहास हमें बताता है कि यह रास्ता खतरनाक है।” उन्होंने केशवानंद भारती जैसे ऐतिहासिक फैसलों का भी हवाला दिया।
विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित 100 से अधिक इंडी गठबंधन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव सौंपा है।
दूसरी ओर, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस कदम को “तुष्टिकरण की राजनीति” बताते हुए कहा कि “देश के इतिहास में सिर्फ किसी फैसले को लेकर जज पर महाभियोग लाना बेहद खतरनाक परंपरा की शुरुआत है।”
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन का विवादित फैसला क्या था?
तिरुप्पारनकुंड्रम सुब्रमण्यस्वामी मंदिर में दीप जलाने से जुड़े पुराने विवाद पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने राज्य सरकार और मंदिर प्रशासन की आपत्तियों को खारिज कर दिया था। उन्होंने आदेश दिया कि— एक सदी से चली आ रही परंपरा के अनुसार दीपक उसी ऊँचे स्तंभ पर जलाया जाए, जो ऐतिहासिक रूप से पूजा का केंद्र रहा है।
डीएमके ने इस फैसले का विरोध करते हुए दावा किया था कि इससे क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, क्योंकि पहाड़ी पर मंदिर और दरगाह दोनों स्थित हैं। लेकिन न्यायालय का मानना था कि “ऊपरी स्तंभ भी मंदिर की ही संपत्ति है, इसलिए इसे पूजा परंपरा का हिस्सा होना चाहिए।”
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