भिलाई का ऐतिहासिक मैत्री बाग जू छत्तीसगढ़ का सबसे पुराना और प्रमुख जू माना जाता है। इसकी नींव वर्ष 1965 में रखी गई थी, जब इसे बच्चों के मनोरंजन के लिए एक साधारण गार्डन के रूप में शुरू किया गया था। झूले, फिसलपट्टी और सामान्य खेल-सुविधाओं से शुरू हुआ यह परिसर 1972 में आधिकारिक रूप से ‘जू’ के रूप में स्थापित किया गया। शुरुआती दौर में यहाँ केवल हिरण, बंदर और चिड़ियों जैसी सीमित प्रजातियाँ थीं।
समय के साथ यह जू विकसित हुआ और 1976-78 के बीच शेर और बाघ जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियाँ भी यहाँ लाई गईं। आज मैत्री बाग जू लगभग 400 वन्य प्राणियों का घर है, जिसमें सांभर, नीलगाय, लकड़बग्घा, लोमड़ी, हायना, लेपर्ड, घड़ियाल आदि शामिल हैं। लगभग 140 एकड़ में फैला हुआ यह परिसर बोटिंग, टॉय ट्रेन, म्यूजिकल फाउंटेन और गार्डनिंग जैसी मनोरंजन सुविधाओं से लैस है।
हर साल करीब 12 लाख पर्यटक यहाँ घूमने आते हैं, खासकर छुट्टियों और त्योहारों के दिनों में भारी भीड़ देखी जाती है। इसके बावजूद जू का खर्च उसकी आय से कई गुना अधिक है। जू के प्रबंधन में लगभग 50 कर्मचारी लगे हैं, लेकिन टिकट दरें कम होने के कारण कुल आय महज 1.5 करोड़ रुपये तक रहती है, जबकि खर्च 4 करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है। इस आर्थिक नुकसान की वजह से जू को चलाना बीएसपी के लिए चुनौती बन गया है।
इसी बढ़ते खर्च और प्रबंधन के बोझ को देखते हुए बीएसपी ने इस 60 साल पुराने जू को पहली बार पूरी तरह आउटसोर्स करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए इच्छुक निजी कंपनियों से प्रस्ताव मंगाए गए हैं। यह छत्तीसगढ़ का पहला जू होगा, जिसे निजी प्रबंधन के हाथों सौंपा जाएगा।
मैत्री बाग जू सिर्फ मनोरंजन का केंद्र नहीं, बल्कि देश में सफेद बाघों के प्रमुख संरक्षण स्थलों में से एक है। यहाँ से अब तक 19 सफेद बाघ पैदा हुए हैं, जिनमें से 13 को विभिन्न राज्यों जैसे गुजरात, यूपी, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों में भेजा जा चुका है। वर्तमान में भी यहाँ 6 सफेद बाघ मौजूद हैं। देश में सफेद बाघों की कुल आबादी लगभग 160 मानी जाती है, जिनमें से अकेले मैत्री बाग का योगदान 19 का है।
निजीकरण की यह प्रक्रिया जू के भविष्य, सुविधाओं, रखरखाव और उसके संरक्षण कार्य को नए स्वरूप में बदल सकती है। आने वाले समय में यहाँ और आधुनिक सुविधाएँ जुड़ सकती हैं, लेकिन इसके साथ ही स्थानीय लोगों में यह चिंता भी है कि निजी प्रबंधन कहीं टिकट मूल्य बढ़ाकर इसे आम लोगों की पहुँच से दूर न कर दे।